Thursday, June 27, 2013
Sunday, March 17, 2013
माँ -- दिगंबर नासवा
सभी ब्लॉगर साथियों को नमस्कार आज पेश है दिगंबर नासवा जी माँ पर लिखी एक बेहतरीन रचना ......!
मैने तो जब देखा अम्मा आँखें खोले होती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है
बँटवारे की खट्टी मीठी कड़वी सी कुछ यादें हैं
छूटा था जो घर आँगन उस पर बस अटकी साँसें हैं
आँखों में मोती है उतरा पर चुपके से रोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है
मंदिर वो ना जाती फिर भी घर मंदिर सा लगता है
घर का कोना कोना माँ से महका महका रहता है
बच्चों के मन में आशा के दीप नये संजोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है
चेहरे की झुर्री में अनुभव साफ दिखाई देता है
श्वेत धवल केशों में युग संदेश सुनाई देता है
इन सब से अंजान वो अब तक ऊन पुरानी धोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है !!
मैने तो जब देखा अम्मा आँखें खोले होती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है
बँटवारे की खट्टी मीठी कड़वी सी कुछ यादें हैं
छूटा था जो घर आँगन उस पर बस अटकी साँसें हैं
आँखों में मोती है उतरा पर चुपके से रोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है
मंदिर वो ना जाती फिर भी घर मंदिर सा लगता है
घर का कोना कोना माँ से महका महका रहता है
बच्चों के मन में आशा के दीप नये संजोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है
चेहरे की झुर्री में अनुभव साफ दिखाई देता है
श्वेत धवल केशों में युग संदेश सुनाई देता है
इन सब से अंजान वो अब तक ऊन पुरानी धोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है !!
@ राज चौहान
Wednesday, November 21, 2012
सीख रहा हूँ दुनियादारी - डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"
सभी ब्लॉगर साथियों को नमस्कार आज पेश है चर्चा मंच के बेहतरीन चर्चाकार आदरणीय रूपचंद शास्त्री जी एक पुरानी बेहतरीन रचना .......!
सम्बन्धों के चक्रव्यूह में,
सीख रहा हूँ दुनियादारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।
खुदगर्जी के महासिऩ्धु में,
कैसे सुथरा कहलाऊँगा?
पीने का पानी सागर से,
गागर में कैसे पाऊँगा?
बिना परिश्रम, बिना कर्म के,
क्या बन पाऊँगा अधिकारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।
जीवन के झंझावातों से,
कदम-कदम पर लड़ना होगा।
बाधाओं को दूर हटाकर,
पथ पर आगे बढ़ना होगा।
जीवन का अस्तित्व बचाना,
मेरे जीवन की लाचारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।
माँ ने जन्म दिया है मुझको
बापू ने चलना बतलाया।
जन्मभूमि ने मेरे मन में,
देशप्रेम का भाव जगाया।
अपने पथदर्शक गुरुओं का,
सदा रहूँगा मैं आभारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।
@ राज चौहान
Friday, November 9, 2012
दीपों का यह पर्व -- धीरेन्द्र सिंह जी
सभी ब्लॉगर साथियों को नमस्कार अब आप सभी के समक्ष पुन:
उपस्थित हूँ ! दीपावली के पवन अवसर पर धीरेन्द्र सिंह भदौरिया जी एक बेहतरीन रचना .......!
दीपक करने आ गए,धरती पर उजियार
आलोकित संसार है, भाग रहा अंधियार.
उजलापन यह कह रहा,मन में भर आलोक
खुशियाँ बिखरेगी सतत,जगमग होगा लोक.
दीपक नगमे गा रहे,मस्ती रहे बिखेर
सबके हिस्से है खुशी,हो सकती है देर.
छत पर उजियारा पला,रौशंन हुई मुडेर
या खुद लक्ष्मी आयेगी,या उसको ले टेर,
जगमग सारा जग हुआ,नगरऔर हर गाँव
संस्कार की जय हुई,मिली नेह को ठांव.
अंतर्मन उजला हुआ,दीपों का यह पर्व
हर इंसा अब कर रहा,आज स्वमं पर गर्व,
सत्य आज फिर पल रहा,धर्म करे जयघोष
अहंकार मत पालना,वरना खुद का दोष,
उजियारा इक भाव है,उजियारा गुणधर्म
उजियारे से प्रगति है ,समझो प्रियवर मर्म.
आलोकित संसार में,हरदम पलता प्यार
उजलेपन से ही सदा,जीवन पाता सार,
दीपों की यह है कथा,जीवन में उजियार
संघर्षो के पथ रहो, कभी न मानो हार,
धीरेन्द्र सिंह जी का आभारी हूँ उन्होंने हमेशा ही मेरा उत्साहवर्धन किया है
........................बहुत बहुत आभार धीरेन्द्र सिंह जी
@ राज चौहान
Tuesday, September 18, 2012
गणेश चतुर्थी की हार्दिक बधाई ...!!
Sunday, September 16, 2012
परंपरा -- रामधारी सिंह "दिनकर"
आप सभी ब्लॉगर साथियों को मेरा सादर नमस्कार काफी दिनों से व्यस्त होने के कारण ब्लॉगजगत को समय नहीं दे पा रहा हूँ पर अब आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ प्रसिद्ध कवि रामधारी सिंह "दिनकर" जी के साथ उम्मीद है आप सभी को पसंद आयेगी.......!!
परंपरा
परंपरा को अंधी लाठी से मत पीटो |
परंपरा
परंपरा को अंधी लाठी से मत पीटो |
उसमे बहुत कुछ है,
जो जीवित है,
जीवन दायक है,
जैसे भी हो,
ध्वसं से बचा रखने लयक है |
पानी का छिछला होकर
समतल मे दोडना,
यह क्रंनति का नाम है |
लेकिन घाट बँआनधकर
पानि को गहरा बनाना
यह पुरमपरा का नाम है|
पंरपरा और क्रंनति में
संघषऋ चलने दो |
आग लगि है, तो
सूखि डालो को जलने दो|
मगर जो डालें
आज भी हरि है ,
उनपर तो तरस खाओ|
मेरि एक बात तुमा मान लो |
लोगो कि असथा के अधार
टुट जाते है,
उखडे हुए पेड़ो के समान
वे अपनि ज़डो से छुट जाते है|
परुमपरा जब लुपत होति हैं
सभयता अकेलेपन के
दर्द मे मरति है|
कलमे लगना जानते हो,
तो जरुर लगाओ,
मगर ऐसी कि फ़लो मे
अपनि मिट्टी का सवाद रहे|
और ये बात याद रहे
परुमपरा चिनि नहि मधु है|
वह न तो हिन्दू है, ना मुसलिम ....!!!
-- रामधारी सिंह "दिनकर"
Friday, August 10, 2012
ब्लॉग जगत के सभी मित्रों को कान्हा जी के जन्मदिवस की हार्दिक बधाइयां !!!
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