Wednesday, November 21, 2012

सीख रहा हूँ दुनियादारी - डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक"

सभी ब्लॉगर साथियों को नमस्कार आज पेश है चर्चा मंच के बेहतरीन चर्चाकार आदरणीय रूपचंद शास्त्री जी एक पुरानी  बेहतरीन रचना .......!
 
सम्बन्धों के चक्रव्यूह में,
सीख रहा हूँ दुनियादारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।

खुदगर्जी के महासिऩ्धु में,
कैसे सुथरा कहलाऊँगा?
पीने का पानी सागर से,
गागर में कैसे पाऊँगा?
बिना परिश्रम, बिना कर्म के,
क्या बन पाऊँगा अधिकारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।

जीवन के झंझावातों से,
कदम-कदम पर लड़ना होगा।
बाधाओं को दूर हटाकर,
पथ पर आगे बढ़ना होगा।
जीवन का अस्तित्व बचाना,
मेरे जीवन की लाचारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।

माँ ने जन्म दिया है मुझको
बापू ने चलना बतलाया।
जन्मभूमि ने मेरे मन में,
देशप्रेम का भाव जगाया।
अपने पथदर्शक गुरुओं का,
सदा रहूँगा मैं आभारी।
जब पारंगत हो जाऊँगा,
तब बन जाऊँगा व्यापारी।।
 
@ राज चौहान 

7 comments:

  1. बहुत सार्थक और प्रेरक रचना 1

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  2. बहुत सुन्दर रचना आज दुबारा पढ़ी उतनी ही अच्छी लगी साझा करने के लिए हार्दिक आभार

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  3. लाजवाब रचना है ! वाह !

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  4. बहुत खूब , शब्दों की जीवंत भावनाएं... सुन्दर चित्रांकन
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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