Sunday, March 17, 2013

माँ -- दिगंबर नासवा

सभी ब्लॉगर साथियों को नमस्कार आज पेश है दिगंबर नासवा  जी माँ पर लिखी एक बेहतरीन रचना ......!

 
मैने तो जब देखा अम्मा आँखें खोले होती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है

बँटवारे की खट्टी मीठी कड़वी सी कुछ यादें हैं
छूटा था जो घर आँगन उस पर बस अटकी साँसें हैं
आँखों में मोती है उतरा पर चुपके से रोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है


मंदिर वो ना जाती फिर भी घर मंदिर सा लगता है
घर का कोना कोना माँ से महका महका रहता है
बच्चों के मन में आशा के दीप नये संजोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है

चेहरे की झुर्री में अनुभव साफ दिखाई देता है
श्वेत धवल केशों में युग संदेश सुनाई देता है
इन सब से अंजान वो अब तक ऊन पुरानी धोती है
जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है !!



@ राज चौहान  
 

9 comments:

  1. बहुत सुंदर .....हर पंक्ति मन छूने वाली....नासवा जी को शुभकामनायें और आपको भी !

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  2. बहुत सुद्नर आभार आपने अपने अंतर मन भाव को शब्दों में ढाल दिया
    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    एक शाम तो उधार दो

    आप भी मेरे ब्लाग का अनुसरण करे

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  3. शुक्रिया राज जी ... माँ की यादों में डूबा हुवा जो भी लिखता हूं कम ही लगता है ...
    आपका आभार सभी तक इस रचना को ले जाने का ...

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  4. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  5. बहुत ही उम्दा मन को छूती सुंदर प्रस्तुति,,,
    Recent Post: सर्वोत्तम कृषक पुरस्कार,

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  6. नसवा जी को नियम से पढ़ती हूँ....इस भावपूर्ण रचना को दुबारा पढ़वाने का शुक्रिया...

    अनु

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  7. चेहरे की झुर्री में अनुभव साफ दिखाई देता है
    श्वेत धवल केशों में युग संदेश सुनाई देता है
    इन सब से अंजान वो अब तक ऊन पुरानी धोती है
    जाने किस पल जगती है वो जाने किस पल सोती है !!


    हृदयस्पर्शी भावाभिव्यक्ति....

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  8. बहुत सुन्‍दर और सार्थक रचना आभार
    हिन्‍दी तकनीकी क्षेत्र की अचंम्भित करने वाली जानकारियॉ प्राप्‍त करने के लिये एक बार अवश्‍य पधारें
    टिप्‍पणी के रूप में मार्गदर्शन प्रदान करने के साथ साथ पर अनुसरण कर अनुग्रहित करें MY BIG GUIDE

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  9. बहुत ही सुन्दर और हदयस्पर्शी रचना !!

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