Sunday, September 21, 2014

रिश्तों को घर दिखलाओ - कुँअर बेचैन

सभी साथियों को मेरा नमस्कार आप सभी के समक्ष पुन: उपस्थित हूँ कुँअर बेचैन जी की रचना...... रिश्तों को घर दिखलाओ के साथ उम्मीद है आप सभी को पसंद आयेगी.......!!

माँ की साँस
पिता की खाँसी
सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं।

छोड़ चेतना को
जड़ता तक
आना जीवन का
पत्थर में परिवर्तित पानी
मन के आँगन का-
यात्रा तो है; किंतु सही अभियान नहीं।
सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं।

संबंधों को
पढ़ती है
केवल व्यापारिकता
बंद कोठरी से बोली
शुभचिंतक भाव-लता-
'रिश्तों को घर दिखलाओ, दूकान नहीं।'
सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं ।

 लेखक परिचय - कुँअर बेचैन 


15 comments:

  1. कुंवर जी की बहुत ही प्रभावी रचना ...
    आभार इसके प्रकाशन का ...

    ReplyDelete
  2. मन को प्रभावित करती भावपूर्ण सुन्दर रचना |

    ReplyDelete
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (22-09-2014) को "जिसकी तारीफ की वो खुदा हो गया" (चर्चा मंच 1744) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच के सभी पाठकों को
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

    ReplyDelete
  4. भावपुर्ण रचना...

    ReplyDelete
  5. यात्रा तो है; किंतु सही अभियान नहीं।
    सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं।

    चलता तो है जीव पथिक पर -

    मंजिल का अब भान नहीं है

    सुन्दर रचना है कुसुमेश जी की।

    ReplyDelete
  6. 'रिश्तों को घर दिखलाओ, दूकान नहीं।'
    सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं । सुन्दर रचना

    ReplyDelete
  7. बदलते परिवेश में संबन्धों के प्रति आए परिवर्तन का बहुत ही प्रभावशाली प्रस्तुति। "सुनते थे जो पहले, अब वे कान नहीं" ये अकेली पक्ति जाने कितनी पक्तियों की बात यूँ कह गुजरती है। बहुत-बहुत धन्यवाद इस रचना को प्रस्तुत करने लिए और कुंवर बेचैन जी को हार्दिक बधाई भी।

    ReplyDelete
  8. bahut sundar ......bahut acchha laga bechain jee ko padhna

    ReplyDelete
  9. बहुत ही बेहतरीन और प्रशंसनीय प्रस्तुति....


    इंडिया दर्पण
    की ओर से आभार।

    ReplyDelete
  10. बेचैन जी की रचना को साझा करने के लिए धन्यवाद.

    ReplyDelete
  11. भागदौड की जिन्दगी हमसे बहुत कुछ छीन लेती है ....
    उम्दा रचना पढवाने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद सर जी


    आखिर आपके ब्लॉग तक आना हो ही गया......अच्छा ब्लॉग है.

    ReplyDelete